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पुस्तक में से लिए गए कुछ महत्वपूर्ण अंश
‘आर्य ईश्वर पुत्रः’ = जो पुरुष सदाचारादि द्वारा परमात्मा की आज्ञापालन करता है, वह उसके पुत्र समान है । इसलिये ‘आर्य’ को यहाँ पुत्र कहा गया है ।
‘कृ॒ण्वन्तो॒ विश्व॒मार्य॑म्’ = सम्पूर्ण विश्व को आर्य बना लो । अर्थात, याज्ञिक लोगों ! तुम आर्य जाति को बढ़ाते हुए इस विस्तृत भूमण्डल में बिना रोक-टोक के विचरो ।
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जिन यज्ञों में आत्मा का संस्कार किया जाता था, उनका नाम ‘आध्यात्मिक’ है; जिनसे शरीर तथा इन्द्रियों का संस्कार किया जाता था अथवा जल, वायु आदि की शुद्धि की जाती थी, उनका नाम ‘आधिभौतिक’ है; और जिनसे सूर्य, चन्द्रमा आदि दिव्य शक्तियों का ज्ञान प्राप्त किया जाता था, उन्हें ‘आधिदैविक’ यज्ञ कहते थे ।
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‘गां मा हि॑सी॒’ = गौओं की हिंसा मत करो ।
‘गावो मेध्यन्ते यत्र स गोमेधः’ = जहाँ इन्द्रियों को ज्ञान द्वारा पवित्र किया जाय, उसका नाम ‘गोमेध’ है ।
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‘विश्वामित्र’ = जो पुरुष प्राणीमात्र को मित्रता की दृष्टि से देखे, उसका नाम वेद में ‘विश्वामित्र’ है ।
‘अत्रि = न त्रयो विद्यन्ते यस्मिन् स अत्रिः’ = जिसमें आध्यात्मिकादि तीनों ताप न हो, उसका नाम ‘अत्रि’ है ।
‘वाजं बलं विभर्तीति भारद्वाजः’ = जो बल का देने वाला हो, उसका नाम ‘भारद्वाजः’ है ।
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आइये हम सब मिलकर पुनः वैदिककाल की स्थापना करें
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